एकतरफा जीना भी क्या जीना होता है ये उसे कौन समझाए
बारिशों में अक्सर निजामुद्दीन से जंगपुरा तक बारापुला ओवरब्रिज ने हमारे लिए छाते का काम किया था...अक्सर तुम ओवरब्रिज को पीछे छोड़ बारिश से साफ हो रहे दिल्ली को गन्दा करने निकल जाती...और हाथ ऐसे आगे बढ़ाती की हाथ को हाथ में लेने तक उन बूंदों का कब्ज़ा हो जाता था...और मैं उन बूंदों को दोनों हाथों तले उसे ऐसे सहेजता मानो इसे फिर देखेगा कौन...वैसे बात तो यही सही है की बूंदों को बूंदों से मिला देना चाहिए पर कुछ मामलात में हम इंसान बड़े लालची होते है...और मैं भी इंसान ही ठहरा...सम्भालता तो कब तलक और कैसे...आखिर सूख गया और कुछ असर कुछ तलक छोड़ गया जैसे सभी छोड़ते है...कुछ, कुछ देर तलक तो कुछ क्षणिक...आज फिर इन बारिशों ने पुरानी यादों पर पानी डाल उसे नवजीवन दे गयी...पर एकतरफा जीना भी क्या जीना होता है ये उसे कौन समझाए...

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